भारतीय सेना ने पिथौरागढ़ में सामुदायिक रेडियो स्टेशन‘पंचशूल पल्स’ का किया उद्घाटन

रणनीतिक संचार, सांस्कृतिक संरक्षण और सीमावर्ती समुदायों के सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल करते हुए, लेफ्टिनेंट जनरल अनिन्द्या सेनगुप्ता, पीवीएसएम, यूवाईएसएम, एवीएसएम, वाईएसएम, जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, सेंट्रल कमांड ने 23 मई 2025 को पिथौरागढ़ में कुमाऊं क्षेत्र के पहले सामुदायिक रेडियो स्टेशन ‘पंचशूल पल्स’ का उद्घाटन किया।


अग्रिम क्षेत्र में स्थित यह रेडियो स्टेशन भारतीय सेना की एक अभिनव पहल है, जिसका उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों को सशक्त बनाना, स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा देना, जनहित से जुड़ी जानकारी साझा करना, और पर्यटकों को मौसम तथा मार्ग की स्थिति से अवगत कराना है। यह स्टेशन सेना, सिविल प्रशासन और एल ए सी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) के निकटवर्ती गांवों के नागरिकों के बीच एक प्रभावशाली संचार सेतु के रूप में कार्य करेगा।


‘पंचशूल पल्स’ की टैगलाइन “हिल से दिल तक” है, जो इस रेडियो स्टेशन की स्थानीय समुदाय से निकटता और भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाती है। यह सामुदायिक रेडियो स्टेशन क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का प्रसारण करेगा, जिनमें कुछ प्रमुख कार्यक्रम निम्नलिखित हैं:-
• स्थानीय समस्याओं और सरकारी योजनाओं पर केंद्रित चर्चाएं
• ग्रामीणों, युवाओं, पूर्व सैनिकों और महिला नेतृत्वकर्ताओं के साथ साक्षात्कार
• कुमाऊं की सांस्कृतिक विरासत, लोक संगीत, त्यौहारों और परंपराओं पर आधारित कार्यक्रम
• शिक्षा, स्वास्थ्य, डिजिटल साक्षरता और आपदा प्रबंधन से जुड़ी जागरूकता
• पर्यटकों और नागरिकों को मौसम एवं सड़कों की जानकारी प्रदान करना
इस रेडियो स्टेशन का नाम ‘पंचशूल पल्स’, पंचशूल पर्वत श्रृंखला से प्रेरित है, जो इस सीमावर्ती क्षेत्र की दृढ़ता और सांस्कृतिक जड़ों का प्रतीक है। यह पहल भारत सरकार के ‘वाइब्रेंट विलेजेज़ प्रोग्राम’ के उद्देश्यों से भी मेल खाती है, जो सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे, कनेक्टिविटी और जागरूकता को सुदृढ़ करने के लिए समर्पित है।
उद्घाटन समारोह के अवसर पर, लेफ्टिनेंट जनरल सेनगुप्ता ने परियोजना के लिए सेना और प्रशासन की सराहना की, तथा स्थानीय नागरिकों से ‘पंचशूल पल्स’ को सहयोग देने और इसे अपनी आवाज़ बनाने का आह्वान किया। उन्होंने इस प्रयास को न केवल एक संवाद मंच, बल्कि एक संवेदनशील, समावेशी और सांस्कृतिक रूप से जीवंत पहल के रूप में भी रेखांकित किया।

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